अब रोक न शिव तू कंठ हलाहल, सब विकल हो रहे जलने को !
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सोमवार, 16 नवंबर 2009
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पता नहीं अकस्मात् ये भावनाएँ क्यों झिंझोड़ जाती हैं । निमंत्रण बिना आती हैं और उद्वेलित कर चली जाती हैं ।