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सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

मरुथल का तीर

पाँव-फफोले देख-देख तू क्यों सकुचाए अधीर, 
आगे बढ़ कर देख मिलेगा - इस मरुथल का तीर।  

 – प्रकाश ‘पंकज’

बुधवार, 25 जनवरी 2012

कमाने की तड़प में खाना भूल गए?

खाने की तड़प से ही तुमने कमाना सीखा ... 
..... और कमाने की तड़प में खाना भूल गए   – प्रकाश ‘पंकज’

गुरुवार, 23 जून 2011

कभी न पूरी हो सकने वाली जिद्द

तारीखें याद नहीं रहती,
घड़ियों को देखना छोड़ दिया..
मैंने हर उसके लिए रुकना छोड़ना सोंचा था जो मेरे लिए न रुका ...
..
(कभी न पूरी हो सकने वाली जिद्द?)

- प्रकाश 'पंकज'

बुधवार, 22 जून 2011

कैसी है रे होड़ सजन सब पाक चरित सुलगावै?

कैसी है रे होड़ सजन सब पाक चरित सुलगावै?
का करी घर मा बैठ कहो निज धरती आग लगावै? – प्रकाश 'पंकज' 

ऐ खाकनशीनों उठ बैठो, वह वक्त करीब आ पहुंचा है,
जब तख्त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे।
अब टूट गिरेंगी जंजीरें, अब जिंदानों की खैर नहीं,
जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएंगे।
दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएंगे,
कुछ अपनी सजा को पहुंचेंगे, कुछ अपनी सजा ले जाएंगे।
कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाजू भी बहुत हैं,सर भी बहुत,
चलते भी चलो कि अब डेरे, मंजिल पे ही डाले जाएंगे।  - फैज अहमद फैज 

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

वाह रे ग्लोबलाईजेशन ! तूने घरवालों को भी बेघर कर दिया

वाह रे ग्लोबलाईजेशन !
तूने घरवालों को भी बेघर कर दिया।
सभी खानाबदोश जैसे इधर-उधर भाग रहे हैं;
शायद उन्हें भी पता नहीं, क्यों?

– प्रकाश ‘पंकज’



 * चित्र: गूगल साभार 

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

हनुमान तो सबके भीतर है, जगाने वाले जामवंत की आवश्यकता है।

"उस युग के जामवंत"
"इस युग के जामवंत"
हनुमान तो सबके भीतर है,
जगाने वाले जामवंत की आवश्यकता है।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

सम्मान पाने के लिए सम्मान देना सीखें

यदि आप खुद को मुझसे छोटा समझते हैं,
मैं आपसे बहुत छोटा हूँ
यदि आप मुझसे बड़े होने का दम्भ भरते हैं,
तो मैं आपसे भी बड़ा हूँ।  – प्रकाश ‘पंकज’

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

अंगद सा हमने पद रोपा

ले नाम सियावर रामचन्द्र,
अंगद सा हमने पद रोपा।
है पूत कहीं ऐसा जग में
जो पाँव हमारे डिगा सके?  
 –प्रकाश ‘पंकज’


सन्दर्भ: अंगद की आस्था और विश्वास

शनिवार, 20 नवंबर 2010

वो क्या थी नभ की छत – प्रकाश ‘पंकज’

वो क्या क्षुधा का स्वाद था?
वो क्या थी नभ की छत?

रविवार, 14 नवंबर 2010

"बाल मजदूरी कानून".. किसका अभिशाप? किसका वरदान?

"बाल-मजदूरी कानून".. किसका अभिशाप? किसका वरदान?

गजब के घटिया कानून है देश के:

एक समृद्ध परिवार का बच्चा जिसकी परवरिश बड़े अच्छे ढंग से हो रही है, अपने स्कूल और पढाई छोड़ कर टी.वी. सीरियल या फिल्म में काम करता है सिर्फ और सिर्फ अपनी और अपने परिवार की तथाकथित ख्याति के लिए तो यह "बाल-मजदूरी" नहीं होती। वेश्यावृति करने वाली मीडिया भी इसे प्रोत्साहित करती है।

वहीँ अगर कोई बच्चा अपने और अपने परिवार वालों का पेट पालने के लिए प्लेट धो लेता है तो यह "बाल-मजदूरी" हो जाती है और वहीँ यह दोगली मीडिया उस बात को उछाल-उछाल कर कान पका देती है।

.. हमारे यहाँ ऐसे लोगों की भी कमी बिल्कुल नहीं है  जो कहेंगे कि वे टी.वी. शो वाले प्रतिभा को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ऐसे लोगों को मेरा एक ही जबाब है अगर आपके बच्चों का टी.वी. शो में नाचना गाना प्रतिभा हो सकती है तो हरेक शाम अपनी और अपने घरवालों की रोटी जुगारने की कोशिश में उन बच्चों की प्रतिभा कहीं से भी कम नहीं है, बल्कि ज्यादा ही है। और,  अगर आप उनके सामाजिक विकास और शैक्षणिक विकास की बात करें तो दोनों जगहों पर एक हीं बात सामने आती है कि वे सभी अनिवार्य शिक्षा से दूर हो रहे हैं। जुलाहे का बच्चा तो सुविधा नहीं मिलने के कारण शिक्षा में पिछड़ रहा है पर आपका बच्चा तो सुविधाओं के बावजूद उस धारा में बह रहा है जो शैक्षणिक विकास से बिलकुल अलग है। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाली पीढ़ी एक "कबाड़ पीढ़ी" पैदा होगी।

यहाँ मै कानून को लाचार ही नहीं उन लोगों का नौकर भी समझूंगा जिनके पास पैसा है, शक्ति है, वर्चस्व है। यही लोग कानून को कुछ इस तरह से बनाते है कि जिनके पास ऐसी समृद्धि है वो इससे निकल सकते हैं और जिनके पास नहीं है वो पिसे जाते हैं इन कानूनी दैत्य-दन्तों द्वारा।

अगर कोई होटल-ढाबे वाला किसी को जीविका देने के लिए "बाल-मजदूरी" करवाने का दोषी हो सकता है तो आज हम सारे लोग जो बड़े मजे से टी.वी. के सामने ठहाके मारते हैं, वाह-वाह करते है, मेरी नज़र में वो सब दोषी हैं "बाल-मजदूरी" करवाने के।
... कानून माने या न माने।
... आप माने या न मानें।
... और मुझे यह भी मालूम है कि अकेले सिर्फ मेरे मानने से भी कुछ नहीं होने को है।

और अंत में इतना हीं कहूँगा कि यदि आपमें अब भी समाज के प्रति थोड़ी नैतिक जिम्मेदारी बची हो तो इसपर विचारें और ऐसे टी.वी. सीरियलों, फिल्मों का "प्रतिकार" करें, सामाजिक बहिष्कार करें, उनका सहभागी न बनें, किन्नरों जैसे तालियाँ न पीटें।

चलता हूँ और आपके लिए कुछ लिंक छोड़ जाता हूँ। धन्यवाद!

बुधवार, 10 नवंबर 2010

'पंकज-पत्र' पर पंकज की कुछ कविताएँ: प्रतिकार

'पंकज-पत्र' पर पंकज की कुछ कविताएँ: प्रतिकार

पिछले कुछ दिनों से मेरे मन की स्थिति दयनीय थी। चाह रहा था कुछ लिखना पर लिख नहीं पा रहा था। करुण स्थिति में लिखी गई यह कविता समाज के कुछ ऐसे कुख्यात प्रकार के लोगों को समर्पित है जो की "निम्न" हैं :
अनुच्छेद।।१।। कलमाड़ी, अशोक चव्हाण, ए. राजा और उन जैसे भ्रष्ट लोगों के लिए।
अनुच्छेद।।२।। आई.आई.पी.एम के चोटी वाले अरिंदम जी जैसे अन्य शिक्षा के व्यापारियों के लिए। 
अनुच्छेद।।३।। गिलानी, अरुंधती जैसे अन्य देशद्रोहियों और राष्ट्र-विरोधियों के लिए जो देश की अखंडता पर चोट करते हैं।
कविता का पता (जरूर पढ़ें): 'पंकज-पत्र' पर पंकज की कुछ कविताएँ: प्रतिकार

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

मुझे हर चीज़ में डंडा करने की बुरी आदत है

लोग कहते हैं,
मुझे हर चीज़ में डंडा करने की बुरी आदत है।

मैं सोंचता हूँ,
डंडे से तो कुछ बदला नहीं,
अबकी बाँस उठाकर कोशिश करूँ।

*चित्र: गूगल साभार 

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

जीना एक आडम्बर साला मरना भी पाखंड !

जीना एक आडम्बर साला
मरना भी पाखंड !  

 – प्रकाश ‘पंकज’



अनुपयुक्त शब्द प्रयोग के लिए क्षमा पर रोक नहीं पाया।
चित्र: गूगल देव साभार

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

फिर भी न जाने कैसे हम निर्लज्जों को राष्ट्र पर गर्व है

हमारे हिन्दुस्तान में

हिन्दी कम जानना या नहीं जानना बड़े गर्व की बात है,

पर अंग्रेजी कम जानना एक शर्म की बात है

और अंग्रेजी नहीं जानना डूब मरने की बात है।

... फिर भी न जाने कैसे हम निर्लज्जों को राष्ट्र पर गर्व है

– प्रकाश 'पंकज'

सोमवार, 21 जून 2010

ये दुनिया एक खन्जर है !

ओ दुनिया, मेरी अर्थी पर सर न झुकाना, रोना मत,
सर उठा कर फक्र से यूँ कहना,
मार डाला उस कमबख्त को जो कहता फिरता था - 
"ये दुनिया एक खन्जर है !"  
- पंकज

बुधवार, 16 जून 2010

भईया हम तो बिहारी हैं


भईया हम तो बिहारी हैं,

.. उगते सूरज से पहले 

डूबते सूरज को प्रणाम करते हैं,

अर्घ्य देते हैं !  

- प्रकाश 'पंकज'

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

दो जर्जर बाँसों की सीढी

दो बाँसों की बनी है यह सीढी ,
क्या है? तोड़ डालो ।
अच्छी खासी ऊंचाई तक पहुँच ही गए हो
और वापस जाने का विचार तक नही लाना है मन में ।
व्यर्थ ही इस सीढी को देखकर बार-बार तुम
संकोच करोगे आगे बढ़ने से,
ऊपर देखोगे नजरें झुकाकर,
जयघोष कर भी पराजित समझोगे ।
उनकी टकटकी लगाती निगाहों को देख व्यर्थ ही,
तुम्हे बार-बार अपने बचपन में जाना होगा,

जहाँ तम्हें चलने से ज्यादा गिरने की आदत थी,
और दो हरे भरे चेहरे तम्हें चलने को प्रेरित करते थे।
खाने से ज्यादा भूखे रहने में मजा आता था,
बिना उद्देश्य के बस खेलना पसंद था,
पर उन दो चेहरों को इनसे शायद इर्ष्या होती थी,
तम्हारे भूख से, चाहते नही थे की तुम क्षुधा का स्वाद तक भी लो,
तम्हारे निर्लक्ष्य जीवन तक को उन्हों ने बरबाद कर दिया ।


अरे छोडो इन बातों को, आगे देखो !
देखो कोई तुमसे पहले अगली मंजिल तक न जा पहुंचे,
तोड़ दो इस पुरानी सीढी को व्यर्थ ही अपना समय बर्बाद कर रहे हो ।
काम नही आने वाली यह सीढी अब तुम्हारे।
न हीं इनकी हड्डियों में वो बल रहा की तुम्हे सहारा दे सके,
तम्हें और ऊपर उठा सके अगली मंजिल तक ।
इनका भार अब तुम्हे न उठाना परे,
देखो भाग चलो !

भूल कर भी अब इनका सहारा मत लेना,
ख़ुद तो इन्हे टूटना ही है, कहीं तुम्हे न गिरा दें ।
आगे बढो! ऊपर चढो ऊपर!
मत देखो नीचे इन जर्जर बाँसों को ।
जरा भी न विचारो इन्हें !
तुम निकले हो विश्व जीतने,
देखो बंध न जाए तुम्हारे पैरों से ये
उड़ न पाओगे तुम कभी,
पिछड़ जाओगे भीड़ में ,
खो एक जैसी शक्लों की भीड़ में,
पहचानेगा नही कोई तुम्हे,
इन दो बूढे बाँसों के सिवा ।
अरे ! देखो...ये क्या?
तुमसे पीछे चलने वाले आगे जा रहे हैं,
विलम्ब न करो मिटा दो अस्तित्व इनका ।

क्या सोचते हो?
छोड़ दोगे इन्हे अपनी हाल पर?
बादल गरज रहे हैं , वर्षा के जल से फूल जाएँगे,
फ़िर क्या धूप भी है न.. इन्हे सुखा देगी।
और ये अकेले तो नहीं एक दूसरे की देखभाल कर सकते हैं ।
एक टूटेगा तो भी क्या?
इनके पायदान के जोड़ इतने तो मजबूत है कि
यह सीढी न टूटेगी ! यह पीढी न टूटेगी !
टूट जाए सारे बंधन, यह बंधन न टूटेगा ।
बहुत ढीठ हैं जानता हूँ ।
हाँ , दोनों टूट जाएँ तब की बात दूसरी है ।
पर यह तो होना ही है न?
परे रहने देता हूँ इन्हे यहीं ।

न ! न ! न ! ऐसी भूल न कर !
निकल न पायेगा इस भंवर से तू ।
कभी तो सोने जाओगे,
सोने नहीं देंगी तुम्हें ये सजल ऑंखें,

इन्हीं रास्तों पर
नभ को चादर मान परे रहेंगे ,
राह देखते एक कर्मनिष्ठ की ।
किचरों में सने करते रहेंगे विनतियाँ,
पंक को न चाहिए कुछ अपने इष्टदेव से,
बस इतनी ही कृपा हम मांगते त्रिदेव से,
शौर्य दे इतना उसे , पूर्ण हो मनोकामना !
हम राह देख हैं रहे, अपने श्रवण कुमार की।

.......... पर तुम्हारे कामनाओं की भी कोई सीमा है ?
-प्रकाश 'पंकज'
यह कविता अनुभूति पर भी प्रकाशित: http://www.anubhuti-hindi.org/nayihawa/p/prakash_pankaj/index.htm 

रविवार, 6 दिसंबर 2009

मानवता अवसाद हो गयी स्वान-संस्कृति उभर रही,

मानवता अवसाद हो गयी स्वान-संस्कृति उभर रही,
पर इसमें भी सुन्दरतम विश्वास्पात्रता कहाँ  रही ?