गुरुवार, 11 नवंबर 2010

हम उगते सूर्य से पहले डूबते सूर्य को पूजते हैं।


भईया हम तो बिहारी हैं,
उगते सूर्य से पहले
डूबते सूर्य को पूजते हैं,
अर्घ्य देते हैं,

धन्यबाद करते हैं !

है किसी और में ऐसा साहस, इतनी विनम्रता ?  

अगर हो तो अति सुंदर।  

जिसने दिन भर हमें राह दिखाया, चलने की शक्ति दी, मनोबल कम न हो ऐसी उर्जा दी, उनकी पूजा हम पहले करते हैं, उसे धन्यबाद हम पहले करते हैं 
और बाद में उनकी पूजा करते हैं जो हमारे आगे की दिनचर्या में सहायक होंगे ..

.. उगते सूरज को तो सभी पूजेंगे इसमें कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि उनके बिना दिनचर्या नहीं चलने वाली, यह एक मजबूरी है ..
पर महान वही है जो उस सीढ़ी को कभी न भूले जिसपर चढ वो अपनी मंजिल की ओर बढ़ता है और उनके प्रति श्रद्धा रखता है ..

... यह बात यहीं तक नहीं रह जाती बल्कि अपने माता-पिता के प्रति भी यही भाव होना चाहिए
उन डूबते हुए सूर्य को उनके बच्चे कभी न भूलें
हे समदर्शी सूर्यदेव! हमें कुछ देना न देना पर इतनी बौद्धिक क्षमता जरूर देना कि हर डूबते सूर्य के योगदान को समझें, उनका आदर करें, उनके प्रति श्रद्धा रखें और किसी भी ढलते सूर्य को अकेला न छोडें ।

आपको और आपके परिवार को छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!

6 टिप्‍पणियां:

  1. काफी सुंदर तरीके से अपनी भावनाओं को अभिवयक्त किया है........

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  2. यह मेरा अप्रत्यक्ष जबाब था उन मराठी मानुस और उन जैसी सोंच रखने वालों के लिए ..

    हे समदर्शी सूर्यदेव! आप उन्हें भी समद्रष्टा बनावें और इतना बोध जरूर करावें कि वे ऐसा कर के सिर्फ और सिर्फ अपने राष्ट्र को तोड़ रहे हैं..

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  3. भैया पूजिये कभी भी.. सूर्य तो वही है :)
    छठ की शुभकामनाएँ!

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  4. पंकज भाई एही के कहल जाला "जोर के झटका जोर से"|
    राउर बात एक दम सही बावे केहू ईसन नईखे जे डूबत के सहारा देव लेकिन एगो भोजपुरी भाषी अगर उगत के सम्मान करेला ता डूबत के भी ओतने सम्मान करेला |
    रौवा और राउर पूरा परिवार के हमरा तरफ से छठ के बहुत बहुत बधाई |

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  5. ये सिर्फ बिहारी ही नहीं हम भारतीयों की संस्कृति है पंकज जी,,इक्का-दुक्का चोर उचक्का के कुछ कह देने से उसे भारत की वाणी मत समझिए..बहुत अच्छी लगी अपकी ये कविता..

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