शुक्रवार, 19 जून 2009

धरा तपेगी व्योम तपेगा, तिल-तिल हर इन्सान मरेगा - १

मैं एक पेड़ हूँ जो खड़ा है एक A.C (वातानुकूलन यंत्र) के वायु निकास के सामने, ऐसा लोग कहते हैं पर सच तो यह है की उस वायु निकास वाले डब्बे को मेरे सामने रखा गया है जो आग की तरह मुझे कब से झुलसाने की कोशिश कर रहा है | अकस्मात् ही कभी मैं रो पड़ता हूँ इन मनुष्यों के स्वभाव को देखकर जो स्वयं अपनी जाति के साथ हमारा भी अहित किये जा रहे हैं | अपने साथ वो हमें और बाकी के सारे जीवों को नष्ट करने पर तुले हैं | दो-दो आँखों के होते हुए भी वे अंधे हैं , या तो फिर वो वास्तविकता को देखना ही नहीं चाहते | वे यह क्षण भर के लिए भी क्यों नहीं सोचते कि भविष्य में वे धरती पर क्या छोड़ जायेंगे, क्या ये महल, ये अट्टालिकाएं और उनमें लगी वातानुकूलन यंत्र क्या इस धरती का सृजन कर सकेंगी? हमारी यह सुजला- सुफला धरती ऐसी रह पायेगी?

समझ नहीं आता मैं हंसूं या रोऊँ उस दिन कि दुर्दशा देख कर | बात है २५ मई २००९ की | एक चक्रवात के आने की सूचना मिली थी | बंगाल की खाड़ी से उठे एक चक्रवात जिसे लोगों ने (जरूर ही किसी मौसम विभाग के अधिकारी ने) 'आइला' नाम दिया | वर्षो बीत गये थे मुझे किसी चक्रवात को देखे पर मैं भी औरों की तरह चिंतित था | मुझे यह लग रहा था कि प्रकृति आज मानव के अत्याचार का उत्तर देने वाली है | जो प्रकृति सबका सृजन करती है, विनाश लाने वाली है |

उस वातानुकूलित यंत्र के पंखे को देख कर मुझे कुछ भिन्न सा प्रतीत तो रहा था | जो मुझे कई महीनों से झुलसाने कि कोशिश कर रहा था उसका भी विनाश मुझे दिख रहा था | साथ ही इसका आनंद ले रहे लोग जो बंद कक्ष में बैठ बाहर के जलते वातावरण से अनभिज्ञ अपने कार्यों में रमे रहते हैं, उन सबकी दशा पर मुझे न जाने क्यों दया आने लगी | सारे लोग अपने अपने घर जल्द से जल्द पहुँचना चाह रहे थे | सड़कों कि हालत बिगड़ रही थी | मेरे जैसे कई पेड़ गिर रहे थे , न जाने क्या-क्या अभिशाप दे रहे होंगे मानव जाति को, या शायद उन्हें इस संकट से बचाने की याचना कर रहे हों ईश्वर से | क्योंकि हमलोग जीते तो है ही प्रकृति के लिए, प्रकृति के जीवों के लिए, पर मृत्यु के बाद भी चाहते हैं कि हमारा शव किसी अच्छे प्रयोजन में लाया जाये, किसी जिव को छत्रछाया मिल जाये हमारे शव से तो हमारी मृत्यु भी सफल हो जाती है |
मैं बात कर रहा था उस दिन कि जब प्रकृति ने बंगाल के कुछ क्षेत्रों में विनाश का मन बना ली थी | उस दिन लोग भाग रहे थे गिरते हुए पेड़ों और खम्भों से सावधान | बसें नहीं मिल रही थी कि वो लोग अपने घर जा सकें, जो मिल रही थी वो भीड़ से ठसा-ठस | जिनके पास अपनी गाड़ी थी वो कुछ लोग को अपने साथ ले जा रहे थे पर कितनों को ले जाते | मैं तो प्रार्थना कर रहा था - "हे ईश्वर ! ये सारे चेहरे मेरी पहचान के हैं ऐसा न हो कि कोई मेरे जैसा भरी भरकम पेड़ उन गाड़ियों पर टूट कर गिरे और ना ही कोई खम्भा" - जिसका मुझे सबसे ज्यादा डर था | जो बसें लोगों के लिए जगह जगह (जहाँ नहीं रुकना चाहिए वहां भी) रुका करती थीं आज उन बसों पे चढ़ने के लिए मधुमक्खियों कि तरह लोग जुट जा रहे थे |

लोगों को उस दिन भी यह याद नही आया होगा की यह सब उन्ही के कर्मों का परिणाम है | हमेशा की तरह आज भी वो अपना और सिर्फ अपना क्षण-स्थायी बचाव करने में लगे थे | पर अभी तक तो सिर्फ चक्रवात का संकेत मात्र मिला था | चक्रवात आना अभी बाकी था | यह प्रभाव सिर्फ चक्रवात आने से पहले का था | अति तीव्र वेग वायु जो शायद एक पतले दुबले आदमी को धकेल कर गिराने के लिए काफी था | आज बड़े अधिकारियों में और मज़दूरों में कुछ ज्यादा फर्क नही दिख रहा था | मुझे यह सोचकर संतुष्टि हो रही थी की शायद इनमें से कुछ-एक लोग तो समझेंगे पर्यावरण की महत्ता को और यह जानेंगे की ये सब उन्ही के कारण हो रहा है | पर्यावरण को असंतुलित करने का सारा श्रेय उनको ही जाता है |पर शायद ही किसी ने सोचा होगा क्योंकि इतने व्यस्त लोगों के पास समय कहाँ होता है?

चक्रवात के आने का समय था शाम ५ बजे से शाम के ७ बजे तक और अभी सिर्फ ३ ही बजे थे | कुछ देर मैं भी अपनी हित की सोचने लगा | सोचा कितना अच्छा होता कि ये सारे पंखे जो कि ऊँचे ऊँचे इमारतों कि सारी गर्मी को समेट कर हमारे ऊपर आग कि तरह बरसाता है | पूरे वातावरण को गर्मी से झुलसा कर अंदर इमारतों में बैठे लोगों को इतना तक ज्ञात नहीं होने देता कि यह गर्मी का मौसम है या सर्दी का | आज मेरा तन और मन इस वृष्टि से तृप्त हो रहा था पर मै वायु के प्रबल वेग से बुरी तरह झंझोरा जा रहा था | मैने सोचा आज अगर मै गिरा भी दिया जाऊँ इस पवन वेग से तो तो यह एक प्राकृतिक मौत होगी इन मनुष्यों के द्वारा झुलस-झुलस कर मरने से तो काफी अच्छा होगा - तृप्त हो मरूँगा |

यह चक्रवात निसंदेह प्रकृति के कोप था | मेरे जैसे कई पेड़ गिर रहे थे और साथ में लगी दीवारों को भी गिरा रहे थे | जो लोग भीगने मात्र से डरते थे वो आज भीगने कि चिंता न कर सुरक्षित घर पहुँचने कि कोशिश में लगे थे | अचानक देखा पवन वेग तीव्र हुआ और मेरा शत्रु परास्त होता दिख रहा था | वो पंखे वाला डब्बा खुल कर छज्जे से निचे गिरने वाला था | और देखते देखते गिर भी गया और वह अपने ही पुर्जों में बिखर गया | मेरा खुश होना अपेक्षित था पर मानवों का यह दुर्दिन देख अपनी ख़ुशी को भी मै भूल बैठा और यह विनती करने लगा -"हे इश्वर! इन्हें सदबुध्धि दो | किसी न किसी माध्यम से इन्हें सचेत करो उस महाप्रालय से जो कि आ सकता है पर्यावरण के असंतुलन से | हे इश्वर! इन्हें सचेत करो" | और इसी चिंतन में मैं खो गया और स्वयम को झंझावात को समर्पित कर परिणाम की चिंता छोड़ प्रार्थना करने लगा इन मतलबी इंसानों के लिए |

------------------------------------------------------------------------------- क्रमशः

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर लिखा है . हमें भी उद्वेलित कर गयी....
    अगले भाग का इंतज़ार ...................
    धन्यबाद

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  2. बहुत ही अच्छा लेखन

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  3. Very different & deep thinking...
    After log time I have read such a good article, otherwise now a days people only writes only on those topics which are raised by media...we find so many " Mirch-Msala & Bikaoo " type of Articles...
    Good Wishes...

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  4. bahut achcha laga padh kar . thank you

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  5. आनेवाले दिनों के पर्यावरण के बारे में सोंचते हुए आपने बहुत सुंदर आलेख लिखा है .. हम सब को इस विषय पर गंभीरता से सोंचना चाहिए।

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