रात में उस सड़क पर बहुत कम लोग थे। बारिश अभी-अभी रुकी थी। बिजली के खंभे के नीचे पानी जमा था। वहीं दीवार से सटकर एक आदमी बैठा था।
दूर से देखने पर वह कोई लावारिस लगता, पर नज़दीक जाते ही उसकी काया आँखों में खटकने लगती। वह एक परजीवी लग रहा था - ‘विचित्रांग’। उसने यहाँ के माहौल में घुलने-मिलने के लिए इंसानी चोला धरने की पूरी कोशिश लगाई थी, पर वह ढाँचा ऐसा था जैसे किसी बाहरी ने इन्सान की मूरत गढ़ी हो और कुछ बारीकियाँ छूट गई हों। उसे छूते ही माथा ठनका था। देह तो आदमी की थी, पर चमड़ी ऐसी चिकनी जैसे किसी रबर के पुतले पर मोम चढ़ा दिया गया हो। पोरों पर कृत्रिम रेखा, रोयें में पैटर्न। और जब उसने आँखें झपकाईं, तो लगा जैसे उसने सिर्फ पलक झपकने के लिए पलक झपकाई, उसके आँखों की जरूरत नहीं थी।"
वह रूप न पूरी तरह मानुष बन पाया था, न परजीवी रह सका था; एक ऐसा अधूरा, बेढब आवरण जो साफ़ बता था कि यह देह इस माटी की नहीं है।
वह सिसक रहा था। अपने विचित्रांग हाथों से सीने को ज़ोर से भींचे हुए, मानो पसलियों के भीतर कुछ ऐसा धड़क रहा था जो उसके काबू से बाहर था।
मैंने जैसे ही उसका कंधा छुआ, मुझे ऐसा लगा मुझसे कोई बातें कर रहा है। बिना किसी बोली-बानी के फेर के, उसकी आवाज़ सीधे मेरी चेतना में गूँज उठी :-
"पृथ्मन... मेरे सीने में खिंचती इस गिरह को खोलने का कोई उपाय है तुम्हारे पास? यह अंदर क्या उबल रहा है? आँख से यह खारा पानी क्यों टपक रहा है, जबकि कुछ ही देर पहले मेरा पूरा शरीर किसी अनजाने नशे में तैर रहा था?"
वह मुझसे बिना किसी आवाज के बातें करने लगा । उसकी अंदर की तरफ मुझे भी महसूस होने लगी।
"यहाँ भटकते हुए मैं लगभग 271 सूरज देख चुका हूँ," उसने अपनी काँपती, अजीब उँगलियों को मोड़ते हुए कहा, "और इन दो सौ इकहत्तर दिनों में मुझ पर भावनाओं के अनगिनत हथौड़े चले हैं। एक के बाद एक... लगातार चोट। कभी किसी की बेबसी ने तोड़ा, कभी किसी की हँसी ने पिघलाया। बार-बार के इस आघात ने मुझमे कुछ ऐसा भर दिया है जिसने मुझे अंदर से भी बदल दिया है। मेरे अपने लोक में ऐसा कुछ नहीं है। वहाँ न्यूरॉन ही सबकुछ है और उसमें दौर वाली तरंगें। वहाँ जीवन केवल प्रकृति के अकाट्य नियमों, गणितीय संतुलन और ऊर्जा के संचरण पर चलता है। जन्म एक जैविक अनिवार्यता है, काम एक प्रणालीगत चक्र, और मृत्यु सिर्फ बेकार और थक चुके न्यूरॉन के लोथड़े का निस्तारण। न कोई किसी के आने पर मुस्कुराता है, न जाने पर विलाप करता है। सब कुछ इतना तर्कसंगत कि वहाँ दुःख मुमकिन ही नहीं... क्योंकि वहाँ सुख की भी कोई समझ नहीं है।"
उसने अपनी यादों के कपाट खोले और मेरे सामने में वे सारे विचार-परिदृश्य एक धारा में तैरने लगे, जहाँ उसने इंसानी जज़्बातों को एक अनजान प्रयोगशाला की तरह जिया था।
उसने दिखाया कि जब फुटपाथ पर भूखी बैठी एक औरत ने दिन भर में मिली सिर्फ आधी सूखी रोटी खुद न खाकर अपने खाँसते हुए बच्चे के मुँह में डाल दी थी। उसने अपने वैज्ञानिक मस्तिष्क से गणना की थी - यह तर्क के खिलाफ है। अपनी ऊर्जा को समाप्त करके दूसरे को देना जीवित रहने के बुनियादी नियम का उल्लंघन है। पर जब उस औरत के चेहरे पर बच्चे को चबाते देख एक चमक आई, तो इस परग्रही के सीने में पहली बार एक मीठी सी टीस उठी थी। वह समझ नहीं पाया कि बिना खाए पेट कैसे भर जाता है।
उसने एक कॉर्पोरेट दफ्तर के बाहर दो दोस्तों को देखा था, जहाँ एक ने अपने प्रमोशन के लिए दूसरे के महीनों के काम को चुरा लिया था। जिस दोस्त की आँखें नम थीं, उसे कहते सुना - "प्रमोशन छिनने का कोई दुख नहीं यार... बस झटका इस बात का है कि मैंने उस पर आँख मूँद कर ट्रस्ट किया था।" उसने सोचा था कि भरोसा कोई ठोस वस्तु है क्या जो टूट गई? पर जब उसने उस आहत लड़के के मस्तिष्क की तरंगों को स्कैन किया, तो वहाँ वही तड़प थी जो किसी अंग के कट जाने पर होती है।
उसने देखा, जब बाढ़ के बाद कीचड़ में सने एक टूटे हुए घर के बाहर एक छोटा बच्चा रंगीन कागज़ की नाव बना रहा था। उसने समझा कि आपदा के बाद सृजन की उम्मीद है यह।
उसने ईर्ष्या देखी थी, क्रोध देखा था, करुणा समझी थी, और इन सबका जो सबसे विकराल रूप प्रेम भी देखा, जहाँ इंसान अपनी पूरी सत्ता किसी दूसरे के कदमों में बिना किसी मुनाफे के गिरवी रख देता है।
फिर उसकी चेतना से वे सुखद और चकित कर देने वाले परिदृश्य उभरे, जिन्होंने उसे अचरज से भर दिया था:
उसने दिखाया - जब रेलवे फाटक पर कड़कड़ाती ठंड में एक बूढ़े रिक्शेवाले ने अपनी जेब से दस का नोट निकाला, एक चाय और 2 बिस्कुट लिया जिसमें से एक उसने अपने पैर के पास काँप रहे एक लावारिस कुत्ते के आगे रख दिया। ऊर्जा संचय के नियम के खिलाफ जाकर उसने खुद को आधा भूखा रखा, पर उसके चेहरे पर जो संतोष था, वह किसी सम्राट जैसा था।
उसने दिखाई उस छोटी बच्ची की बेपरवाह हँसी - जिसने तपती दुपहरिया में स्कूल बस की खिड़की से एक कागज का हवाई जहाज हाथ में लिए पसीने से लथपथ ठेला खींचते मज़दूर को देखकर अपनी दो टूटी दाँत वाली हँसी बिखेरी, और उस मज़दूर का थका हुआ, पथरीला चेहरा एक पल में खिल उठा था।
उसने शाम की लोकल ट्रेन के पायदान पर खड़े उस नौजवान मज़दूर का अचिन्त्य मन दिखाया, जो दिन भर गिट्टियाँ ढोने के बाद जेब से पाँच रुपये की मूँगफली चबाते हुए हवा के थपेड़ों के बीच ऐसे मुस्कुरा रहा था मानो पूरी कायनात उसकी हो।
तभी उसकी स्मृति से वह अनोखा विचार-परिदृश्य उभरा - शाम ढलने के वक़्त का एक दृश्य। एक बड़ी कोठी से दिन भर झाड़ू-बर्तन और पोंछा करके एक कामवाली बाई बाहर निकली थी। देह थकान से चूर थी, पर सामने सड़क के पार एक खाली ज़मीन पर किसी नए मकान की नींव भरी जा रही थी। मज़दूर गहराई से खोदकर निकाली गई ताजी, गीली और चिकनी मिट्टी के ढेर ट्रेलर से गिरा रहे थे। उस औरत की निगाहें उस ताज़ी माटी पर ऐसे ठहर गयी जैसे किसी जौहरी की नजर किसी अनमोल रत्न पर पड़ गई हो।
उस मिट्टी में कोई बहुमूल्य सम्पदा नहीं थी। पर उस औरत की आँखों में ज़मीन के गर्भ से निकली उस शुद्ध माटी का ऐसा अगाध लोभ उमड़ा कि उसने झिझकते हुए अपनी झोली से एक पुरानी पन्नी निकाली। मज़दूरों की नज़र बचाते हुए उसने झुककर उस ताज़ी मिट्टी के दो-तीन बड़े ढेले उठाए और उस पन्नी में रख लिए। वह शायद उस मिट्टी से अपने कच्चे घर की देहरी लीपना चाहती थी; या शायद अपने उस नन्हें चूल्हे पर लेपना चाहती थी जिस पर रात को रोटियाँ सिंकनी थीं।
और जब वह वहाँ से निकली, तो उसने उस पन्नी को छुपाने के लिए सीने से नहीं चिपकाया। उसने पन्नी के छल्ले को अपनी उँगलियों में फँसाया और उसे हाथ से ऐसे बेधड़क झुलाते हुए आगे बढ़ी, जैसे कोई जीता हुआ मेडल लहरा रही हो। उसके चलने में एक गज़ब का सधा हुआ आत्मविश्वास था - एक ऐसा दिखावा ताकि पीछे खड़ा कोई मज़दूर यह न कह सके कि वह कोई चोरी करके जा रही है। नज़रें सामने, सीना तना हुआ, पर भीतर ही भीतर उस पन्नी को झुलाते हुए उसके पाँव किसी बच्चे की तरह बेतहाशा उछल रहे थे... मानो उसने दो ढेले नहीं, पूरी कायनात जीत ली हो!
विचित्रांग की आवाज़ में गहरा विस्मय गूँजा, "पृथ्मन... किसी बड़े इम्तिहान के टॉपर के भीतर भी सफलता के बाद शायद उतने आनंद के हॉर्मोन न बहे हों, जितने उस औरत के रोम-रोम से उस गीली मिट्टी के ढेलों को जीतते ही फूट रहे थे। जिसका कोई बाजारी मूल्य नहीं, शून्य लागत... पर उससे उपजा सुख अनंत! मेरी तार्किक बुद्धि ने उस दिन समझो हार मान ली थी।"
"पर पृथ्मन," विचित्रांग की आवाज़ काँप उठी, "जब मुझे लगा कि मैंने सुख और दुःख के इस पूरे तराजू को समझ लिया है, ठीक उसके बाद मैंने वह दृश्य देखा जिसने मेरी समझ के सारे तार बिखेर दिए।
आसमान में काले बादल घिरे थे और भारी बारिश की आहट थी। एक शेयर ऑटो खड़ा था। तभी एक औरत वहाँ पहुँची - तन पर मैले-कुचैले चीथड़े, माथे पर एक घाव, नाक में काली पड़ चुकी ताँबे की नथुनी, और गोद में एक बीमार, निढाल बच्चा जो बेसुध अपनी माँ की मैली साड़ी चबा रहा था। उस औरत के पास किराया देने के लिए हाथ में नोट था। उसने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाई कि अंधर-पानी आने से पहले उसे बैठा लें।
पर मैंने देखा कि अंदर बैठे साफ़-सुथरे कपड़े पहने मुसाफ़िर घिन्न से नाक पर रूमाल दबाकर किनारे सिकुड़ गए। उन्होंने उसे पास भटकने तक नहीं दिया। ऑटो वाले ने उसे ऐसे दुत्कार कर भगाया जैसे वह कोई ज़हरीला कीड़ा हो - ‘एई पेछोने जा! गाड़ी जाबे ना बोलछी तो, ओन्नो गाड़ी देख!’ (अरे पीछे जा! गाड़ी नहीं जाएगी बोल रहा हूँ, दूसरी गाड़ी देख!) वह पीछे खड़ी दूसरी गाड़ी की ओर लपकी, वहाँ भी वही हुआ। और अंत में, जब तेज़ मूसलाधार बारिश शुरू हुई, तो वह बेबस माँ अपने बीमार बच्चे को भीगने से बचाने के लिए सुनसान फुटपाथ पर अकेली ठिठुरती रह गई, और उसके पाँव के पास से चमकती हुई बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ कीचड़ उछालती हुई फर्राटे से निकल गईं।
मैं सन्न रह गया, पृथ्मन! तुम्हारे पास भावना का इतना विराट वरदान है, फिर भी एक बाहरी मैले 'आवरण' के कारण तुम अपने ही जैसे जीव को इतनी क्रूरता से दुत्कार देते हो?
उसने अपनी बेढब उँगलियों से मेरी कलाई पकड़ ली, उसकी पकड़ बर्फ जैसी ठंडी थी।
"मैं अब भर चुका हूँ," वह हिचकी लेते हुए बोला, "मेरे भीतर हर पल कोई हँसता है, कोई रोता है, कोई चीखता है। यह सब एक साथ मेरे अंदर टकरा रहे हैं। मेरा सिस्टम क्रैश हो रहा है। पर सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है। मेरे लोग मुझे लेने आने वाले हैं... कुछ ही पलों में। वहाँ मेरी चेतना का एक ही स्कैन होगा। मेरे लोग प्रकृति के निर्मम गणित और भौतिक नियमों पर जीते हैं। उनके लिए भावना सिर्फ एक अवांछित खराबी, एक वायरस होगी जो व्यवस्था को नष्ट कर देगी। वे मुझे फौरन खारिज कर देंगे, अंतरिक्ष के किसी शून्य में फेंक देंगे।"
उसकी आवाज़ में एक हताश याचना उतर आई, "मैं खाली हाथ नहीं जाना चाहता, पृथ्मन। मैं चाहता हूँ कि वे समझें कि यह अभिशाप नहीं, एक वरदान है। मुझे अपने ग्रह पर ले जाने के लिए पृथ्वी से कुछ ऐसा दो... कोई ऐसा अकाट्य विचार-परिदृश्य, जिसे देखते ही उनके न्यूरॉन्स के लोथड़े में भी भावना की पहली चिंगारी सुलग उठे। कुछ ऐसा, जो इतना विराट हो कि भले ही मेरे लोक के हज़ारों-लाखों लोग अपनी पूरी तार्किक ताक़त लगाकर उसे झुठलाने की कोशिश करें, पर वह उदाहरण उन सबके तर्कों से कहीं ऊँचा खड़ा रहे। कुछ ऐसा, जिसे देखकर वे यह मानने पर मजबूर हो जाएँ कि अस्तित्व का सिर्फ भौतिक या गणितीय नियम ही सच नहीं है - बल्कि यह भी एक वास्तविक आयाम (dimension) है, जिससे वे अब तक अनजान रहे हैं।"
मैंने उसके सामने रखा - "प्रेम का प्रतीक: एक ताज़ा लाल गुलाब और प्रेमी का आलिंगन।"
उसने सिर हिलाकर तुरंत खारिज कर दिया। "नहीं। वे इसे देखेंगे और कहेंगे कि यह सिर्फ पौधों का एक प्रजनन अंग है, और आलिंगन केवल डोपामाइन और ऑक्सीटोसिन का एक रासायनिक बहाव है जो प्रजाति को आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति ने प्रोग्राम किया है। वे इसका रासायनिक विश्लेषण करेंगे और फाइल बंद कर देंगे। यह उन्हें नहीं पिघलाएगा।"
मैंने अगला परिदृश्य सोचता ही कि उसने अपनी बड़ी आँखें मूँद लीं, जैसे उस दृश्य से ही उसे दर्द हो रहा हो। "नहीं, पृथ्मन। वे मृत्यु को सिर्फ एक अणु के दूसरे रूप में बदलने का नियम मानते हैं - एंट्रॉपी। वे कहेंगे कि जिसका जीवनकाल समाप्त हुआ, उसका मिटना तय था; उस पर रोना समय की बर्बादी और तर्कहीनता है। वे इसे देखकर हँसेंगे भी नहीं, सिर्फ उपेक्षा से आगे बढ़ जाएँगे।"
मैं संगीत और कला, किसी बाँसुरी की तान या कैनवस पर उकेरा गया कोई अमर दर्द सोच ही रहा था कि उसने एक ठंडी साँस भरी। "उनके लिए संगीत केवल अलग-अलग आवृत्तियों की ध्वनि तरंगें हैं और कला सिर्फ प्रकाश के अपवर्तन का खेल। वे उसकी फ्रीक्वेंसी नाप लेंगे, उसके सुरों का गणित निकाल लेंगे, पर उस राग के भीतर जो आत्मा रो रही है, वह उनके सेंसरों में कभी नहीं आएगी।"
मेरे दिमाग में अब देशभक्ति और बलिदान कौंधने लगा जहां सीमा पर किसी अनजान के लिए अपनी छाती पर गोली खाना अमरता की निशानी है"
उसने कड़वाहट से कहा, "वे इसे सामूहिक पागलपन कहेंगे। वे कहेंगे कि अपने अस्तित्व को किसी भौगोलिक सीमा या विचार के लिए मिटा देना बुद्धिमत्ता का सबसे निचला स्तर है। वे इसे समझ ही नहीं पाएँगे।"
हम दोनों चुप हो गए। रात और गहरी हो गई थी। पृथ्वी के सारे बड़े-बड़े शब्द - प्रेम, त्याग, कला, शहादत - उस ठंडी, परग्रही लॉजिक के सामने बेअसर साबित हो रहे थे।
तभी मुझे उस बात की याद आई जो इस पूरी कायनात के किसी भौतिक या गणितीय नियम में नहीं बँधती।
मैंने उसका हाथ थामकर कहा, उन्हें दिखाना खुशी के वो आँसू, जो किसी दूसरे के सुख को देखकर अपनी आँखों से छलक पड़ते हैं। जहाँ एक बाप अपनी बेटी की कामयाबी देखकर रो पड़ता है, या कोई अजनबी किसी दूसरे अनजान को जीतते देख अपनी आँखें पोंछता है। तर्क कहेगा कि आँसू केवल नुकसान की निशानी हैं, और मुस्कान सिर्फ अपने व्यक्तिगत लाभ की। पर जब वे देखेंगे कि लाभ किसी और का हुआ और आँख से लोर किसी और ने गिराये, तो उनके सारे समीकरण बिखर जाएँगे।" यह है 'सहानुभूति का आनंद'।
विचित्रांग ने अपनी तीखी, तार्किक दृष्टि से इस विचार को तौला। कुछ सेकंड तक उसकी आँखों में गणनाओं की नीली रोशनी तैरती रही।
फिर उसने सिर हिलाते हुए संशय से कहा, "यह गहरा है, पृथ्मन... पर मेरे वैज्ञानिक इसे भी 'मिरर न्यूरॉन्स का अति-सक्रिय सिमुलेशन' कहकर खारिज करने का प्रयास करेंगे। वे कहेंगे कि यह सामाजिक जीवों द्वारा सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक जटिल, अवचेतन भ्रम है। क्या तुम्हारे पास इससे भी अचूक, इससे भी अकाट्य कुछ है?"
मैंने उसकी ठंडी कलाई पर अपनी पकड़ और मज़बूत की, और अपना अंतिम विचार-परिदृश्य उसके सामने खोल कर रख दिया -
"सरकारी अस्पताल के बाहर एक छोटी दवा की दुकान। एक बूढ़ा, कमज़ोर मज़दूर अपनी काँपती उँगलियों से कुर्ते की जेब से कुछ सिक्के और मुड़े-मैले दस-बीस के नोट निकाल कर गिन रहा है। दवा 180 रुपये की है और उसके पास केवल 130 रुपये हैं। वह लाचार होकर दुकानदार के आगे हाथ जोड़कर कहता है - ‘बाबू, तीन दिन एर ओषध कोम कोरे दीन ना... एतो टाका नईखे बाबू।’ (बाबू, तीन दिन की दवा कम कर दीजिए ना... इतना पैसा नहीं है बाबू।) पीछे लाइन में खड़ा एक दूसरा साधारण व्यक्ति यह देखता है। वह आगे आकर कोई भाषण नहीं देता, न बुज़ुर्ग के हाथ में पैसे थमाता है - ताकि उस बूढ़े का स्वाभिमान न टूटे। वह चुपके से काउंटर पर दुकानदार की तरफ पचास का नोट सरका देता है और आँख के इशारे से बुज़ुर्ग को पूरी दवा देने को कहता है। और इससे पहले कि वह बूढ़ा मुड़कर देखे कि क्या हुआ, वह व्यक्ति भीड़ में चुपचाप ओझल हो जाता है।"
विचित्रांग एक पल के लिए अपनी जगह पर पूरी तरह जड़ हो गया।
मैंने आगे कहा, "उन्हें यह दिखाना, पृथ्मन। उनसे पूछना कि जिस व्यक्ति ने वह पचास का नोट सरकाया, उसे क्या मिला? उस बूढ़े को जीवन भर यही लगा कि दुकानदार ने ही कुछ रियायत दे दी। जिसने अपनी जेब खाली की, उसे न उस लाचार की कृतज्ञ आँखें देखने को मिलीं, न दुआएँ सुनने को मिलीं। न कोई गवाह था जो समाज में उसकी वाहवाही करता, न भविष्य में उस बूढ़े से कोई बदला या लाभ मिलने की गुंजाइश थी - क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे। वहाँ डार्विन का स्वार्थी जीन भी मौन हो गया और गेम थ्योरी का गणित भी। अपने हिस्से के संसाधन को बिना किसी पहचान, बिना किसी फल और बिना किसी गवाह के किसी अजनबी के दुःख में चुपचाप विसर्जित कर देना... इसे अकारण करुणा कह सकते हो?"
विचित्रांग ने अपनी दोनों हथेलियों को देखा। उसके चेहरे की विश्लेषक कठोरता धीरे-धीरे पिघलने लगी। उसने इस विचार के हर पहलू को अपने ठंडे वैज्ञानिक तराजू पर रख कर देखा - और पाया कि यहाँ आकर उसका हर पैमाना शून्य हो जाता है।
"यह..." विचित्रांग ने धीमी, थरथराती आवाज़ में स्वीकार किया, "यह सबसे अधिक मारक और अचूक है, पृथ्मन। तुम्हारा पहला प्रस्ताव - 'सहानुभूति का आनंद' - उनके गणित को उलझाएगा ज़रूर, पर यह दूसरा विचार-परिदृश्य... यह तो उनके पूरे तार्किक ढाँचे की नींव ही हिला देगा। यहाँ ऊर्जा के संरक्षण का नियम भी मौन है, और स्वार्थी जीन का सिद्धांत भी। वे इसे किसी 'खराबी' की श्रेणी में नहीं डाल पाएँगे, क्योंकि खराबी में इतना पवित्र और निरपेक्ष सत्य नहीं होता।"
उसने एक गहरा निर्णय लेते हुए कहा, "मैं ये दोनों विचार-परिदृश्य अपने साथ ले जाऊँगा। जब वे मुझे घेरेंगे, तो मैं इन दोनों का अप्रत्याशित ढंग से इस्तेमाल करूँगा। वे पहले पर बहस कर सकते हैं, पर यह दूसरा विचार-परिदृश्य उन सबके तर्कों से कहीं ऊँचा खड़ा रहेगा। भले ही लाखों लोग इसका विरोध करें, यह एक उदाहरण उन्हें यह स्वीकार करने पर विवश कर देगा कि ब्रह्मांड में ऊर्जा और समीकरणों से परे - 'भाव' भी चेतना का एक अकाट्य और वास्तविक आयाम है।"
दूर बादलों के सीने को चीरती हुई एक नीली किरण कौंधी। उसका यान चुपचाप, बिना किसी आवाज़ के ज़मीन के करीब उतर रहा था और विचित्रांग अपनों से मिलने को उतावला।
जाने से ठीक पहले, विचित्रंग ने मुड़कर मुझे देखा। उसके सिंथेटिक, कृत्रिम से दिखने वाले होंठों पर वही सहज, निष्पाप मुस्कान खिली जो उसने उस बूढ़े रिक्शेवाले, उस छोटी बच्ची, और माटी के ढेलों को मेडल की तरह झुलाती उस औरत से सीखी थी। उसने बिना कुछ कहे, इंसानों की तरह दोनों हाथ जोड़कर यान में समा गया।
मेरी आँख खुली तो सुबह की धूप खिड़की के शीशों से छनकर कमरे में उतर रही थी। बाहर सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों की वही तेज़, अंधी रफ़्तार शुरू हो चुकी थी। विचित्रांग के तर्क और अनुभव अभी तक मेरे सर को भारी किए हुए थे। यदि भाव किसी ठंडे ग्रह के पाषाण तर्कों में एक नए आयाम का दरवाज़ा खोल सकता है, तो इस भागती-दौड़ती, पत्थ
र होती दुनिया को भी वापस इन्सान बना सकता है।

.jpg)
0 comments|टिप्पणियाँ: