बुधवार, 1 दिसंबर 2010

अंगद सा हमने पद रोपा

ले नाम सियावर रामचन्द्र,
अंगद सा हमने पद रोपा।
है पूत कहीं ऐसा जग में
जो पाँव हमारे डिगा सके?  
 –प्रकाश ‘पंकज’


सन्दर्भ: अंगद की आस्था और विश्वास

शनिवार, 20 नवंबर 2010

वो क्या थी नभ की छत – प्रकाश ‘पंकज’

वो क्या क्षुधा का स्वाद था?
वो क्या थी नभ की छत?

रविवार, 14 नवंबर 2010

"बाल मजदूरी कानून".. किसका अभिशाप? किसका वरदान?

"बाल-मजदूरी कानून".. किसका अभिशाप? किसका वरदान?

गजब के घटिया कानून है देश के:

एक समृद्ध परिवार का बच्चा जिसकी परवरिश बड़े अच्छे ढंग से हो रही है, अपने स्कूल और पढाई छोड़ कर टी.वी. सीरियल या फिल्म में काम करता है सिर्फ और सिर्फ अपनी और अपने परिवार की तथाकथित ख्याति के लिए तो यह "बाल-मजदूरी" नहीं होती। वेश्यावृति करने वाली मीडिया भी इसे प्रोत्साहित करती है।

वहीँ अगर कोई बच्चा अपने और अपने परिवार वालों का पेट पालने के लिए प्लेट धो लेता है तो यह "बाल-मजदूरी" हो जाती है और वहीँ यह दोगली मीडिया उस बात को उछाल-उछाल कर कान पका देती है।

.. हमारे यहाँ ऐसे लोगों की भी कमी बिल्कुल नहीं है  जो कहेंगे कि वे टी.वी. शो वाले प्रतिभा को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ऐसे लोगों को मेरा एक ही जबाब है अगर आपके बच्चों का टी.वी. शो में नाचना गाना प्रतिभा हो सकती है तो हरेक शाम अपनी और अपने घरवालों की रोटी जुगारने की कोशिश में उन बच्चों की प्रतिभा कहीं से भी कम नहीं है, बल्कि ज्यादा ही है। और,  अगर आप उनके सामाजिक विकास और शैक्षणिक विकास की बात करें तो दोनों जगहों पर एक हीं बात सामने आती है कि वे सभी अनिवार्य शिक्षा से दूर हो रहे हैं। जुलाहे का बच्चा तो सुविधा नहीं मिलने के कारण शिक्षा में पिछड़ रहा है पर आपका बच्चा तो सुविधाओं के बावजूद उस धारा में बह रहा है जो शैक्षणिक विकास से बिलकुल अलग है। अगर ऐसा ही रहा तो आने वाली पीढ़ी एक "कबाड़ पीढ़ी" पैदा होगी।

यहाँ मै कानून को लाचार ही नहीं उन लोगों का नौकर भी समझूंगा जिनके पास पैसा है, शक्ति है, वर्चस्व है। यही लोग कानून को कुछ इस तरह से बनाते है कि जिनके पास ऐसी समृद्धि है वो इससे निकल सकते हैं और जिनके पास नहीं है वो पिसे जाते हैं इन कानूनी दैत्य-दन्तों द्वारा।

अगर कोई होटल-ढाबे वाला किसी को जीविका देने के लिए "बाल-मजदूरी" करवाने का दोषी हो सकता है तो आज हम सारे लोग जो बड़े मजे से टी.वी. के सामने ठहाके मारते हैं, वाह-वाह करते है, मेरी नज़र में वो सब दोषी हैं "बाल-मजदूरी" करवाने के।
... कानून माने या न माने।
... आप माने या न मानें।
... और मुझे यह भी मालूम है कि अकेले सिर्फ मेरे मानने से भी कुछ नहीं होने को है।

और अंत में इतना हीं कहूँगा कि यदि आपमें अब भी समाज के प्रति थोड़ी नैतिक जिम्मेदारी बची हो तो इसपर विचारें और ऐसे टी.वी. सीरियलों, फिल्मों का "प्रतिकार" करें, सामाजिक बहिष्कार करें, उनका सहभागी न बनें, किन्नरों जैसे तालियाँ न पीटें।

चलता हूँ और आपके लिए कुछ लिंक छोड़ जाता हूँ। धन्यवाद!

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

हम उगते सूर्य से पहले डूबते सूर्य को पूजते हैं।


भईया हम तो बिहारी हैं,
उगते सूर्य से पहले
डूबते सूर्य को पूजते हैं,
अर्घ्य देते हैं,

धन्यबाद करते हैं !

है किसी और में ऐसा साहस, इतनी विनम्रता ?  

– अगर हो तो अति सुंदर।  

जिसने दिन भर हमें राह दिखाया, चलने की शक्ति दी, मनोबल कम न हो ऐसी उर्जा दी, उनकी पूजा हम पहले करते हैं, उसे धन्यबाद हम पहले करते हैं 
और बाद में उनकी पूजा करते हैं जो हमारे आगे की दिनचर्या में सहायक होंगे ..

.. उगते सूरज को तो सभी पूजेंगे इसमें कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि उनके बिना दिनचर्या नहीं चलने वाली, यह एक मजबूरी है ..
पर महान वही है जो उस सीढ़ी को कभी न भूले जिसपर चढ वो अपनी मंजिल की ओर बढ़ता है और उनके प्रति श्रद्धा रखता है ..

... यह बात यहीं तक नहीं रह जाती बल्कि अपने माता-पिता के प्रति भी यही भाव होना चाहिए।
उन डूबते हुए सूर्य को उनके बच्चे कभी न भूलें।
हे समदर्शी सूर्यदेव! हमें कुछ देना न देना पर इतनी बौद्धिक क्षमता जरूर देना कि हर डूबते सूर्य के योगदान को समझें, उनका आदर करें, उनके प्रति श्रद्धा रखें और किसी भी ढलते सूर्य को अकेला न छोडें ।

आपको और आपके परिवार को छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!

बुधवार, 10 नवंबर 2010

'पंकज-पत्र' पर पंकज की कुछ कविताएँ: प्रतिकार

'पंकज-पत्र' पर पंकज की कुछ कविताएँ: प्रतिकार

पिछले कुछ दिनों से मेरे मन की स्थिति दयनीय थी। चाह रहा था कुछ लिखना पर लिख नहीं पा रहा था। करुण स्थिति में लिखी गई यह कविता समाज के कुछ ऐसे कुख्यात प्रकार के लोगों को समर्पित है जो की "निम्न" हैं :
अनुच्छेद।।१।। कलमाड़ी, अशोक चव्हाण, ए. राजा और उन जैसे भ्रष्ट लोगों के लिए।
अनुच्छेद।।२।। आई.आई.पी.एम के चोटी वाले अरिंदम जी जैसे अन्य शिक्षा के व्यापारियों के लिए। 
अनुच्छेद।।३।। गिलानी, अरुंधती जैसे अन्य देशद्रोहियों और राष्ट्र-विरोधियों के लिए जो देश की अखंडता पर चोट करते हैं।
कविता का पता (जरूर पढ़ें): 'पंकज-पत्र' पर पंकज की कुछ कविताएँ: प्रतिकार

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

मुझे हर चीज़ में डंडा करने की बुरी आदत है

लोग कहते हैं,
मुझे हर चीज़ में डंडा करने की बुरी आदत है।

मैं सोंचता हूँ,
डंडे से तो कुछ बदला नहीं,
अबकी बाँस उठाकर कोशिश करूँ।

*चित्र: गूगल साभार 

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

संकल्पों के दीप जलाता कदम बढ़ाता चल

संकल्पों के दीप जलाता कदम बढ़ाता चल,
वक्ष दबे बारूदों से खुद राह बनाता चल।  

– प्रकाश 'पंकज'


ये बारूद जो सुलग रहे हैं हम जैसों के भीतर, न जाने कब फूटेंगे,
फूटेंगे भी या फिर बस फुसफुसा कर ही रह जाएँगे - ये भी किसे पता?
... कोई बात नहीं,
आज तो कम से कम कुछ कानफोड़ू धमाके कर के बहरों को सुना देने का भ्रम और मजबूत कर लें!
 
शुभ पटाखोत्सव! ;)
शुभ दीपोत्सव!
आपको  और आपके परिवार को प्रकाश-पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ !

ऐसा दिया जलाएँ मन में, जग उजियारा होए!

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

जीना एक आडम्बर साला मरना भी पाखंड !

जीना एक आडम्बर साला
मरना भी पाखंड !  

 – प्रकाश ‘पंकज’



अनुपयुक्त शब्द प्रयोग के लिए क्षमा पर रोक नहीं पाया।
चित्र: गूगल देव साभार

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

फिर भी न जाने कैसे हम निर्लज्जों को राष्ट्र पर गर्व है

हमारे हिन्दुस्तान में

हिन्दी कम जानना या नहीं जानना बड़े गर्व की बात है,

पर अंग्रेजी कम जानना एक शर्म की बात है

और अंग्रेजी नहीं जानना डूब मरने की बात है।

... फिर भी न जाने कैसे हम निर्लज्जों को राष्ट्र पर गर्व है

– प्रकाश 'पंकज'

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

पूजा के पंडाल या पंडालों की पूजा?

पूजा के पंडाल या पंडालों की पूजा?

सोंच कर जबाब दें, हड़बड़ी नहीं है, दोबारा सोंचें फिर जबाब दें :
१) क्या हम माँ दुर्गा की पूजा करते हैं या पंडालों की, मूर्तियों की, मूर्तियों के सजावट की?
२) क्या आज के युवक युवतियाँ माँ दुर्गा के दर्शन को पंडालों में जाते हैं या वहाँ उमड़ती भीड़ को देखने जाते हैं, अपनी आँखों को सेंकने जाते हैं?
३) हम माँ दुर्गा को नमन करते हैं या वाहवाही करते हैं पंडाल निर्माण समितियों की?
४) एक तरह हम एक भूखे को खिलने की औकाद नहीं रखते और इस तरफ करोड़ों खर्च कर देते हैं। क्या हम सही में माता की भक्ति करते हैं?
५) पूजा आयोजक समीतियाँ क्या सचमुच समर्पित भाव से माँ दुर्गा का भव्य पूजन करती हैं या उन पैसों से अपना धनोपार्जन करती हैं?

हम मूर्खों को यह विचार तक नहीं आता कि माँ दुर्गा के भव्य दर्शन तो मन से ही हो सकते हैं इन पंडालों में क्या रखा है। बस बैठ जाओ एकाग्रचित्त होकर पढ़ जाओ और समझने की कोशिश करो जो लिखा गया है दुर्गा सप्तशती में, दुर्गा सप्तशती जो कि मार्कंडेय पुराण से लिया गया है। यही माँ दुर्गा का सर्वश्रेष्ठ चिंतन और सर्वश्रेष्ठ दर्शन होगा नवरात्र के दिनों में। इन ७०० श्लोकों से कुछ जानने की कोशिश करो कुछ ग्रहण करने की कोशिश करो।

खेलगांव ने तो सिर्फ एक कलमाड़ी को जना है यहाँ पंडालों के पीछे न जाने कितने छोटे-बड़े कलमाड़ी पैदा हो जाते हैं इन १० दिनों में। उन पैसों को समाज कल्याण में लगाया जाता तो और भी बेहतर होता। पर यही नियति है भारत की कि संसाधन पूरे भरे हैं पर लोग जागृत कम हैं, भ्रमित ज्यादा हैं, सुप्त ज्यादा हैं |

मैं खुद को यहाँ जागृत होने का दावा नहीं कर रहा, पर हाँ आप पर सुप्त या भ्रमित होने का संदेह जरूर कर रहा हूँ।

जय माँ दुर्गे, जय माँ भारती। आप सभी लोगों को नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएँ। माँ दुर्गा भारत की सुप्त चेतना को जागृत करें।    – प्रकाश ‘पंकज’


श्री श्री दुर्गा सप्तशती यहाँ से डाउनलोड करें : 
Sri-Sri-Durga-Saptshati-Sanskrit-Hindi
Sri-Sri-Durga-Sapt...
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मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

भरत-पुत्रों की चेतावनी

दुनिया वाले सुन लें ...
भरत-पुत्रों की सहनशीलता का तटबंध जब टूटता है,
वे भीम समान मानवता भूल रक्तपिपासु हो जाते है,
शत्रु-वक्ष की रुधिर-चासनी पी कर ही अघाते हैं ।
 ... कोशिश हो ऐसा रक्तिम इतिहास दोहराया न जाये ।   
– प्रकाश ‘पंकज’

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

कोई न जीता कोई न हारा, बहने दी हमने न्याय की धारा

कोई न जीता कोई न हारा, 
बहने दी हमने न्याय की धारा,
आज चमकता दीख रहा है, 
लोकतंत्र का एक सितारा । – प्रकाश 'पंकज'

रविवार, 26 सितंबर 2010

वो राधा-किशन का प्रेम कहाँ? जगती जिसको दोहरा न सकी।

प्रेम गीत एक लिखने को
फिर कलम हमारी चल न सकी,
वो राधा-किशन का प्रेम कहाँ
जगती जिसको दोहरा न सकी? - प्रकाश 'पंकज'

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

संघर्ष बस अपना रहा, यह कर्म ही अपना रहा ।


न जीत ही अपनी रही, न हार  ही अपनी रही,
संग्राम बस अपना रहा, कर्मभूमि बस अपनी रही ।  
- प्रकाश 'पंकज'

रविवार, 22 अगस्त 2010

क्यों खग समान उन्मुक्तता अब शूल हुई है ?

समय के पिछले पन्नों पर कुछ भूल हुई है,
क्यों खग समान उन्मुक्तता अब शूल हुई है ?   
- प्रकाश 'पंकज'

बुधवार, 18 अगस्त 2010

ऐसे समाज के लिए तो हिटलर चाहिए गाँधी नहीं ।


ये दुनिया बड़ी ढकोसले वाली है ।
कुछ समझाओ तो कहेगी "पहले खुद करो फिर बोलो",
और जब कर दिखा बोलोगे तो कहेगी 
"तुम महान हो, सब तुम जैसे नहीं हो सकते"। 

ऐसे समाज के लिए तो हिटलर चाहिए गाँधी नहीं ।

- प्रकाश 'पंकज'

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

कैसी है यह जागृति जब आँखें मूँद सब चल रहे ?

विकास के उन्माद में सब सो चुके हैं गहरी नींद।
कैसा है यह विकास जो विनाश को आमंत्रित कर रहा है ?
कैसी है यह जागृति जब आँखें मूँद सब चल रहे ?
कैसी है यह शिक्षा जो विनाश को प्रेरित करती है ?
प्रकृति के साथ मानव का कैसा यह संघर्ष है ?    - प्रकाश 'पंकज'

सोमवार, 9 अगस्त 2010

कमबख्त ये जमाना मेरी मार कैसे झेलेगा ?

इस ज़माने की मार तो हम सह ही लेंगे,
कमबख्त ये जमाना हमारी मार कैसे झेलेगा ?  

रविवार, 8 अगस्त 2010

धारा का निर्देशक


धारा में बहने वाले न बनो !
जागृत हो या भ्रमित हो धारा,
धारा में बहते जाओगे ।


धारा को मोड़ने वाले बनो !
जागृत हो या भ्रमित हो धारा, 
सही दिशा ले जाओगे । 

-प्रकाश 'पंकज'